कविता
वो बालक
ठिठुरती ठंड़ का समय,हर कोई उस सर्द हवा में बचते बचाते घरों में दुबका था ,
था सड़क पर बैठा वो बालक जो अपने संग बैठे उस जानवर को अपना कंबल समझे चिपका था
ना कोई परवाह ना कोई झिझक,
बस चेहरे पर भूख की तड़प को लिए बैठा था।
उस सर्द रातों में कौन
उसे भर पेट भोजन देता,
सुबह हुई तो लोगों ने पाया
वो बालक सड़क पर औंधा लेटा था,
शायद हार गया वो सर्द
रातों और भूख की पीड़ा से,
पर उन बंद आँखों में अभी
भी उस पशु के लिए धन्यवाद गहरा था।
(आँचल)
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